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ज्योर्तिमठ बद्रीनाथ और शारदा पीठ द्वारका (Jyotrimath Badrinath and Sharda Peeth Dwarka) के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती (Shankaracharya Swami Swaroopanand Saraswati) का रविवार को निधन हो गया। स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का झारखंड के चाईवासा से खास लगाव (Special attachment to Chaiwasa of Jharkhand) था। चाईवासा मानों उनके लिए उनका परिवार हो यहीं कारण था कि वो हर साल दिवाली सहित प्रमुख त्योहारों के मौके पर चाईवासा आया करते थे। मिली जानकारी के अनुसार वो साल 1959 में पहली बार और साल 2018 में आखिरी बार चाईवासा आए थे।

पहली बार 1959 में चाईबासा पधारे थे स्वामी
एक अखबार में छपी खबर के मुताबिक, स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती चाईबासा आगमन पर उद्योगपति रूंगटा परिवार के महुलसाई स्थित गार्डन गेस्ट हाउस में रुकते थे। जहां चाईबासा के लोग आकर उनका दर्शन और आशीर्वाद लेते थे। शंकराचार्य स्वामी पहली बार 1959 में चाईबासा पधारे थे। उस दौरान रूंगटा के परिवार के संपर्क में आये थे। उनका मुख्य उद्देश्य सनातन धर्म का प्रचार-प्रसार करना और धर्म परिवर्तन करने वालों को वापस लाना था। चक्रधरपुर स्टेशन से सड़क मार्ग से चाईबासा रुंगटा निवास जाने और पुन: ट्रेन से वापस कोलकाता लौटने का सिलसिला 30 वर्षों तक जारी रहा था।

4 वर्ष पूर्व अंतिम बार आए थे चाईबासा
4 वर्ष पूर्व अंतिम बार चाईबासा आये थे। महाराज जी को रूंगटा परिवार से विशेष लगाव था। यही कारण कि उनके घर में आकर अपना पूजा-पाठ करते थे। रूंगटा परिवार भी उसे देवता के समान पूजते थे। मिली जानकारी के अनुसार उद्योगपति नंदलाल रूंगटा, मुकुंद रूंगटा का जन्म संस्कार भी स्वरूपानंद सरस्वती महाराज ने कराया था।

आजादी की लड़ाई में भी लिया था हिस्सा
स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती को हिंदुओं में सबसे बड़ा धर्म गुरु माना जाता था। कुछ दिनों पहले ही स्वरूपानंद सरस्वती ने अपना 99वां जन्मदिन मनाया था। स्वरूपानंद सरस्वती का जन्म एमपी के सिवनी में 2 सितंबर 1924 को हुआ था। वह 1982 में गुजरात के द्वारिका साधक पीठ और बद्रीनाथ के जो ज्योति मटका संघ के शंकराचार्य बने थे। उनके माता पिता ने बचपन में इनका नाम पुतीराम उपाध्याय रखा था। महज 9 साल की उम्र में उन्होंने घर छोड़ धर्म की यात्रा शुरू कर दी थी। इस दौरान वो काशी पहुंचे और यहां उन्होंने ब्रह्मलीन श्री स्वामी करपात्री महाराज वेद-वेदांग, शास्त्रों की शिक्षा ली। स्वामी स्वरुपानन्द सरस्वती ने आजादी की लड़ाई में भी हिस्सा लिया था।