रांची
झारखंड प्रदेश कांग्रेस कमिटी के अध्यक्ष केशव महतो कमलेश ने राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री एवं झारखंड के राज्यपाल को पत्र लिखकर जनगणना-2027 में आदिवासी/सरना धर्म को अलग पहचान के रूप में धर्म कोड में शामिल करने की मांग की है। अपने पत्र में उन्होंने कहा कि झारखंड की पहचान समृद्ध आदिवासी सभ्यता, संस्कृति और प्रकृति पूजक परंपरा से है। यहां के आदिवासी समाज की धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक जीवनशैली का मूल आधार प्रकृति पूजाकृजल, जंगल और जमीन है, जिसकी पहचान सरना धर्म के रूप में है। यह केवल एक आस्था नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही जीवन पद्धति है।

सरना धर्म कोड को शामिल करना अत्यंत आवश्यक
उन्होंने कहा कि आजादी के बाद लंबे समय तक अलग झारखंड राज्य के आंदोलन का मूल आधार भी आदिवासी समाज की विशिष्ट पहचान और उनकी प्रकृति आधारित आस्था रही है। ऐसे में जनगणना-2027 में सरना धर्म कोड को शामिल करना अत्यंत आवश्यक है, ताकि आदिवासी समाज की सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान सुरक्षित रह सके और नीतिगत निर्णयों में उनकी उचित भागीदारी सुनिश्चित हो सके। कांग्रेस अध्यक्ष ने यह भी उल्लेख किया कि वर्ष 2011 की जनगणना में अलग धर्म कोड का कॉलम नहीं होने के बावजूद लगभग 50 लाख लोगों ने स्वयं को सरना धर्मावलंबी के रूप में दर्ज कराया था। यह इस बात का प्रमाण है कि सरना धर्म को अलग पहचान देने की मांग लंबे समय से आदिवासी समाज की भावनाओं से जुड़ी हुई है।

पूरे देश के आदिवासी समाज की भावनाओं का सम्मान
उन्होंने आगे बताया कि 11 नवम्बर 2020 को झारखंड विधानसभा में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार को सरना धर्म कोड शामिल करने की अनुशंसा भेजी गई थी। लेकिन पांच वर्षों से अधिक समय बीत जाने के बावजूद इस दिशा में कोई ठोस पहल नहीं हुई है, जबकि अब देश में जनगणना की प्रक्रिया प्रारंभ हो चुकी है। झारखंड प्रदेश कांग्रेस कमिटी ने केंद्र सरकार से मांग की है कि सरना धर्म कोड को जनगणना-2027 में शामिल करने के लिए अविलंब आवश्यक कार्रवाई की जाए, ताकि न केवल झारखंड बल्कि पूरे देश के आदिवासी समाज की भावनाओं का सम्मान हो सके और उनके समग्र विकास में सहभागिता सुनिश्चित की जा सके।