द फॉलोअप डेस्क:
पश्चिमी सिंहभूम के सारंडा के वन क्षेत्रों, खास कर सदर, गोईलकेरा व टोटो प्रखंडों के आदिवासी-मूलवासियों का जिंदगी उथलपुथल हो गई है। एक तरफ सुरक्षा बलों के अभियान के दौरान हिंसा और दूसरी ओर माओवादियों द्वारा हिंसा होती है। इसके बीच निर्दोष आदिवासी-मूलवासी फंसे हुए हैं। यह बातें झारखंड जनाधिकार महासभा ने कही है। उन्होंने चिट्ठी जारी कर आदिवासियों के साथ हो रही हिंसा पर चिंता जताई है। स्थानीय विधायकों व सांसद से स्थिति को सामान्य बनाने और इन क्षेत्रों के आदिवासियों के लिए लोकतंत्र को पूर्ण बहाल करने के लिए उचित मार्गदर्शन देने की अपील की है।

आदिवासी-मूलवासियों का जीवन उथलपुथल
जनाधिकार महासभा ने अपनी चिट्ठी में बताया की गांवों में डर और दमन का माहौल है। सुरक्षा बलों एवं माओवादियों की आपसी लड़ाई के डर से आदिवासी अपने जंगल भी नहीं जा पा रहे हैं। जो उनके लिए जीवनरेखा समान है। हाल के दिनों में, शाम होते ही सुरक्षा बलों द्वारा गांवों की दिशा में गोलीबारी एवं मोर्टार दागे जा रहे हैं। दूसरी ओर माओवादियों द्वारा जवाबी कार्रवाई का डर। गांव के युवा, बच्चे, बुजुर्ग व महिलाएं, सब दहशत में है। अभियान के दौरान यौन शोषण के डर से महिलाएं अपने घर में ही असुरक्षित महसूस कर रही हैं।
सुरक्षा बलों के कैंप पर जताई चिंता
चिट्ठी के माध्यम से जनाधिकार महासभा ने बिना ग्राम सभा की सहमति के बैठाए जा रहे सुरक्षा बलों के कैंप पर भी चिंता जताई है। चिट्टी में इसे पांचवी अनुसूची प्रावधानों व पेसा का खुला उल्लंघन बताया गया है। कई गांवों में बिना सहमति के कैंप स्थापित होने के बाद गांव-समाज में फूट पड़ रही है एवं गांव का माहौल बिगड़ रहा है। कैंप के आसपास विदेशी शराब गैर-कानूनी तरीके से बीकने लगा है। आदिवासी अपनी परंपरा अनुसार न पूजा कर पा रहे हैं और न जी पा रहे हैं। गैर-आदिवासी व बाहरी सुरक्षा बल की उपस्थिति से गांव में तनाव का माहौल है। इसके एवं अपनी समाज मे हो रहे शोषण- अत्याचार के विरोध में अपनी प्रतिक्रिया देने वाले आम ग्रामीणों को माओवादियों के समर्थक के रूप में देखा जा रहा है। सुरक्षा बलों के डर से ग्रामीण अपनी ग्राम सभा तक नहीं कर पा रहे हैं। ऐसी स्थिति कई गांवों जैसे अजेडबेड़ा, चिरियाबेड़ा, सींगीजारी, पटाःतरोब, रेंगड़ा, सरजोमबुरू, लुईया, सायतबा, लोवोबेड़ा हाथीबुरु, मेरेलगड़ा, तिलेयबेड़ा, हुसीपी, बोयपाईशासन, मारादीरी, सरजोमबुरू व तुम्बाहाका में है। चिट्ठी में जनाधिकार महासभा मौजूदा परिस्थितियों पर चिंता जताई है। साथ ही हालातों को अत्यंत दुखद बताया है। हो आदिवासी सदियों से अपने स्वाभिमान और जल, जंगल, जमीन व प्रकृति के साथ खुले मन से जीए हैं। लेकिन आज वे अपने ही क्षेत्र में कैदी जैसा जी रहे हैं माओवादियों द्वारा किए गए हिंसा की घटना में निर्दोष आदिवासी युवाओं पर पुलिस द्वारा फर्जी मामले डाले जा रहे है। बिना वारंट के कई दिनों तक थाना व कैंप में रखा जा रहे है। ग्रामीण स्थानीय अधिकारीयों व विधायकों से कई बार गुहार लगा चुके हैं।
प्रशासन, पुलिस और स्थानीय विधायकों से की अपील
जनाधिकार महासभा ने प्रशासन व पुलिस से मांग की है कि बिना ग्राम सभा की सहमति के सुरक्षा बलों के कैंप न लगाए जाए एवं मात्र संदेह के आधार पर या माओवादियों को खाना खिलाने के कारण आदिवासी युवाओं को माओवादी हिंसा मामले में फर्जी रूप से न जोड़ा जाए महासभा ने पुलिस व प्रशासन संवैधानिक व कानूनी दायरे में अपनी कार्रवाई करने की अपील कि है। राज्य सरकार से भी मांग कि है की तुरंत जिला व अन्य आदिवासी क्षेत्रों में पांचवी अनुसूची प्रावधानों व पेसा को कड़ाई से लागू करें।
मुख्यमंत्री से इन गांवों के ग्रामीणों से सीधे संवाद करने की अपील
इसके साथ ही महासभा ने स्थानीय विधायकों व सांसद से अपील करते हुए कहा है की स्थिति को सामान्य बनाने एवं इन क्षेत्रों के आदिवासियों के लिए लोकतंत्र को पूर्ण बहाल करने के लिए उचित मार्गदर्शन दे। वे इन गांवों में जाकर ग्रामीणों से बात कर स्थिति को स्वयं देखने समझने और उन्हें बेबसी और आतंक की स्थिति से उबारने का दायित्व निभाए। मुख्यमंत्री से इन गांवों के ग्रामीणों से सीधे संवाद कर उन्हें इस स्थिति से मुक्ति दिलाने की विशेष अपेक्षा है।