द फॉलोअप डेस्क
महाराष्ट्र की राजनीति में अंबरनाथ से ऐसा सियासी संदेश गया है, जिसने महायुति के भीतर चल रही दरार को सार्वजनिक कर दिया है। शिंदे गुट को सत्ता से दूर रखने के लिए भाजपा ने कांग्रेस और अजित पवार गुट की एनसीपी के साथ हाथ मिलाया, जिससे नगर परिषद की सत्ता का संतुलन पूरी तरह बदल गया।
अंबरनाथ नगर परिषद में बने इस नए गठबंधन को ‘अंबरनाथ विकास अघाड़ी’ नाम दिया गया है। 32 पार्षदों के समर्थन से भाजपा-कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन को स्पष्ट बहुमत मिला है। इसमें भाजपा के 14, कांग्रेस के 12 और एनसीपी (अजित पवार गुट) के 4 पार्षद शामिल हैं। इस गठबंधन के दम पर भाजपा की तेजश्री करंजुले नगर परिषद अध्यक्ष चुनी गईं, जबकि शिवसेना शिंदे गुट विपक्ष में चला गया।

इस घटनाक्रम से शिंदे गुट में तीखा असंतोष देखा जा रहा है। शिंदे गुट के नेताओं ने भाजपा पर कांग्रेस-मुक्त भारत के नारे से पीछे हटने और सत्ता के लिए सिद्धांत छोड़ने का आरोप लगाया है। शिंदे गुट का कहना है कि यह गठबंधन राजनीतिक मजबूरी नहीं, बल्कि विश्वासघात है।
भाजपा की ओर से इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा गया है कि शिंदे गुट के साथ बातचीत की कोशिशें की गई थीं, लेकिन कोई सकारात्मक जवाब नहीं मिला। भाजपा नेताओं का दावा है कि नगर परिषद में स्थिर प्रशासन और विकास के लिए यह गठबंधन जरूरी था।

अंबरनाथ में बने इस नए सियासी समीकरण पर एकनाथ शिंदे के बेटे और सांसद श्रीकांत शिंदे की प्रतिक्रिया भी सामने आई है। उन्होंने कहा कि भाजपा-कांग्रेस गठबंधन का सवाल पूरी तरह भाजपा के नेतृत्व का है और वही इसका जवाब देगा। उन्होंने यह भी दोहराया कि शिवसेना विकास की राजनीति के साथ खड़ी रहेगी। अंबरनाथ की यह राजनीतिक तस्वीर साफ कर रही है कि कांग्रेस, भाजपा और शिंदे गुट की यह टकराहट सिर्फ नगर परिषद तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि आने वाले दिनों में राज्य की राजनीति में इसके दूरगामी असर दिख सकते हैं।
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