विवेक आर्यन, रांची:
अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे ने महिलाओं की स्थिति को लेकर नई बहस छेड़ दी है। क्या पहनना है, कहां जाना है, किसके साथ जाना है, क्या करना है और क्या नहीं करना है। ये सभी मौलिक अधिकार महिलाओं से छीने जा रहे हैं, जिसके विरोध में दुनिया भर के लोग अलग-अलग माध्यमों से अपनी बात रख रहे हैं। लेकिन यह चर्चा व्यापक होनी चाहिए। मसलन भारत और भारत जैसे कई देशों में महिलाओं की स्थिति तालिबान के बगैर भी कितनी अच्छी है? जहां तालिबान नहीं है, क्या वहां तालिबानी मानसिकता भी नहीं है? क्या तालिबान का नहीं होना ही महिलाओं के लिए काफी है? हालांकि रह-रहकर घरेलू हिंसा को लेकर सवाल उठते रहते हैं, चर्चाएं होती रहती हैं। लेकिन कोई बदलाव देखने को नहीं मिलता है। इसकी प्रमुख वजह इन समस्याओं में ही नजर आती है। पुलिस के बड़े अधिकारी, नेता या कोई और लगभग सभी तरह के लोगों के चेहरों पर से नकाब उठता रहा है।

शिल्पी तो महज़ एक उदाहरण है
जिंदगी के चार दशक देख चुकी शिल्पी बताती हैं कि शादी के 25 सालों बाद भी उनके साथ मारपीट होती है। उनका एक 23 साल का बेटा भी है। पति अच्छे पोस्ट पर हैं। खानदान बड़ा है। वे खुद भी पढ़ी लिखी हैं। देश-दुनिया को लेकर अपनी समझ है। इन सबके बावजूद वे घरेलू हिंसा की शिकार हैं। अपने बारे में बताते हुए वे कहती हैं “जब चाहे थप्पड़ जड़ दिया, जबड़ा पकड़ लिया, हाथ उठा दिया। यह सब कुछ लगभग 10 सालों से चलता आ रहा है”। उन्होंने कई बार कोशिश की लेकिन किसी को बता नहीं पाई। शिल्पी ने अपनी आधी जिंदगी गुजारने के बाद मास कम्यूनिकेशन से पीजी करने का निर्णय किया था। उन्होंने 2020 में ही अपनी पीजी की पढ़ाई पूरी की। 80 प्रतिशत से उपर अंक भी आए।

शिल्पी कहती हैं कि इन सबके बावजूद जब वे अपने साथ ये सब होता देखती हैं, तो लगता है कि उन्होंने कुछ हासिल नहीं किया है। वे ये भी कहती हैं कि ऐसा सबके साथ हो रहा है। लगभग सभी घरों में। लेकिन कोई आवाज नहीं उठा पाती, जैसे शिल्पी नहीं उठा पा रही थी, कई सालों तक। घरेलू हिंसा में सबसे गंभीर बात है कि महिलाएं किसी के पास जा नहीं सकती। चाह कर भी उस स्थिति से भाग नहीं सकती। किसी को बता नहीं सकती और यह सबकुछ उन्हें और कमजोर करता जाता है। शिल्पी कहती हैं “क्या हमारे घरों में तालिबान नहीं है”?

हर चौथी महिला की यही कहानी
शिल्पी अकेली नहीं है। ये भारत में हर चौथी महिला की कहानी है। यहां हर चार में से एक महिला घरेलू हिंसा की शिकार होती हैं। एनसीआरबी के अनुसार 2018 में घरेलू हिंसा से संबंधित 90 हजार केस दर्ज हुए थे। ऐसे कितने होंगे, जो दर्ज नहीं हुए। अपर क्लास, लोवर क्लास या मिडिल क्लास हर वर्ग में घरेलू हिंसा होती है। सोशल वर्कर रश्मि (बदला हुआ नाम) कहती हैं कि वे समाज में कई तरह के काम करती हैं। आम तौर पर बाहर जाती हैं, लोगों से मिलती हैं। लेकिन उनके साथ भी मारपीट होती है। यह हर दिन नहीं होता, लेकिन इतना होता है कि जिक्र किया जाए। पति के हिसाब से चीजें करनी होती हैं। मारपीट न हो, इसकी जिम्मेदारी भी खुद ही लेनी पड़ती है। कुछ ऐसा न करना जिससे मारपीट की नौबत आए, इस बात का खयाल रखती हैं। रश्मि भी बड़े परिवार से आती हैं। इसलिए चुप भी रहती हैं। लेकिन वे कहती हैं “बंद दीवारों के भीतर बहुत शोर है”। सवाल ठिठका ही है कि ऐसे में समाज का प्रबुद्ध वर्ग ही जब ‘तालिबानी मानसिकता’ से ग्रसित है, तो फिर कैसे हम घरेलू हिंसा को खत्म कर सकेंगे।