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आजादी की लड़ाई में टाना भगतों का योगदान भुलाना मुश्किल है

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आजादी के आंदोलन ने ऐसा कोई जनजातीय समुदाय नहीं मिलेगा, जो इस आंदोलन में गांधी जी का साथ देकर अपना सर्वस्व त्याग कर संघर्ष किया हो। ऐसे में पूरे देश में जनजातीय समाज में मिसाल के तौर पर टाना भगत ही सामने आते हैं। वास्तव में टाना भगतों का जो आदर्श और सिद्धांत था, उसे भुलाया नहीं जा सकता। लेकिन 70 साल बाद भी उनके  हालात नहीं बदले। सरकार द्वारा बहुत सी सुविधाएं उपलब्ध कराने के बावजूद उनकी दशा चिंतनीय है। झारखंड और केंद्र सरकार को टाना भगतों की समस्याओं की ओर ध्यान चाहिए।

द फॉलोअप टीम, रांची:  प्रकृति से लगाव और स्वाधीनता की रक्षा की व्याकुलता जनजातीय स्वभाव व संस्कार की विशेषता है। झारखंड के छोटानागपुर व संतालपरगना में रह रही जनजातियां भी इन्हीं को अपने स्वभावगत गुणों में समेटे हुए हैं। स्वाधीन रहने की छटपटाहट ने ही कई बार अनेक जनजातियों को अंग्रेजी शासन एवं सांमती व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह का शंखनाद फूंकने के लिए बाध्य किया था। इनमें वीर बुधू भगत, बिरसा भगवान एवं जतरा भगत के नाम सर्वोपरि हैं।

अंग्रेजी सत्ता के विरोध में बिरसा मुंडा 
जतरा (उरांव) भगत ने वैष्णव विचारधारा के तहत समाज सुधार आन्दोलन को चलाते हुए अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष का बिगुल बजाया। 19वीं शताब्दी के अंतिम वर्ष में छोटानागपुर के पठारों में एक व्यक्ति – बिरसा मुंडा पूरी शक्ति के साथ अंग्रेजी सत्ता के विरोध एवं जनजातीय जीवन में सामंती कुरीतियों के नाजायज हस्तक्षेप को उखाड़ फेंकने के लिए सार्थक पहल कर रहा था। बिरसा का आंदोलन जनजातीय समाज एवं संस्कृति की अस्मिता की रक्षा के लिए दृढ़ संकल्पित था। इस आन्दोलन में इनके साथ न केवल मुंडा जनजाति बल्कि उरांव जनजाति भी साथ थे। 9 जून 1900  को रांची जेल में संदेहजनक परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हो गयी। इसके बाद छोटानागपुर की घाटियों में जगह-जगह आन्दोलन समाप्त तो नहीं हुआ, लेकिन थोड़ा शिथिल पड़ता जा रहा था।

टाना भगतों का आन्दोलन  
इधर अंग्रेजों के द्वारा धार्मिक, आर्थिक, सांस्कृतिक शोषण-उत्पीड़न के कारण उरांव जनजातियों के बीच असंतोष गहराता जा रहा था। अंग्रेजों के इस व्यवहार से उरांव जन त्रस्त थे। लेकिन संगठित रूप से प्रयास नहीं होने के कारण वे सफल नहीं हो पाते थे। इसी बीच उरांव जनजातियों के बीच से जतरा उरांव जैसे दिलेर नवयुवक का अभ्युदय हुआ। जतरा उरांव धार्मिक, सामाजिक पुनर्रचना का संकल्प के साथ टाना भगत आन्दोलन का महामंत्र लेकर सामने आया। यह युवक बाद में जतरा भगत के रूप में प्रसिद्ध हुआ।

टाना भगत आन्दोलन का नायक था जतरा उरांव 
गुमला जिलान्तर्गत विशुनपुर प्रखंड के चिंगरी (नवाटोली) में सितम्बर महीने के अष्टमी तिथि का 1888  में जतरा का जन्म हुआ था। उनकी माता-पिता का नाम क्रमश: लिबरी तथा कोडल उरांव था। जतरा भगत की पत्नी का नाम बंधनी था। जतरा भगत के चार बेटे बुधे, बंधु, सुधू, देशा तथा दो बेटियों बिरसें और बुधनी थी। देशा का विवाह पंडरी से हुआ उनको एक बेटा बिसुवा और दो बेटियां थीं। बिसुवा की पत्नी का नाम भुधनिया था। उनके तीन बेटे एक बेटी बिसुवा भगत सपरिवार चिंगारी नवाटोली में रहते हैं।

कैसे हुआ जतरा उरांव को आत्मज्ञान ? 
जतरा भगत का बचपन साधारण ढंग से बीता लेकिन छोटी उम्र से ही अपने हमउम्र मित्रों से इनका स्वभाव अलग था। जब जतरा भगत बचपन से किशोरावस्था में पहुंचे तो, उस समय उन्होंने स्कूली पढ़ाई के बजाय झाड़–फूंक की विद्या सीखने के लिए निकट के हेसराग ग्राम आया-जाया करते थे। इसी क्रम में एक दिन वह एक पेड़ पर पक्षी का अंडा उतारने के लिए चढ़ा तो, वह अंडा नीचे गिर कर फूट गया। जिसमें उसे भ्रूण दिखायी दिया। जतरा यह देखकर उसके मन में आया यह तो जीवहत्या है। उसी दिन से उन्होंने जीव हत्या नहीं करने का संकल्प लिया। इसी प्रकार 1914 के अप्रैल माह में एक दिन जब जतरा मति सीखने के क्रम में गुरदा कोना पोस्टर से स्नान करने गये। वहीं स्नान के कर्म में उन्हें आत्मज्ञान हुआ। तमसा नदी के तट पर वाल्मीकि का स्वर फूटा और संस्कृत भाषा का जन्म हुआ। उसी तरह जतरा भगत के मुंह से जो उद्घोष हुआ, वह आगे चलकर टाना पंथ बना।

कैसे कहलाए टाना भगत ?  
जतरा भगत ने लोगों के बीच मांस के खाने, मदिरापान न करने, पशु बलि रोकने, परोपकारी बनने, यज्ञोपवीत धारण करने, भूत-प्रेत के अस्तित्व न माने आंगन में तुलसी चौरा स्थापित करने, गो सेवा, जीव हत्या न करने का उपदेश देना शुरू किया। स्मरणीय है कि जनजातीय लोगों में मांस भोजन का सामान्य भाग है और टोना-टोटकों में अधिक विश्वासी उरांव जनजातियों ने उनकी बात को सरलता से माननी शुरू कर दी। इस तरह देखते– देखते उनके समर्थकों की अच्छी संख्या हो गई। जतरा भगत के इस पंथ का नाम टाना पड़ा और इन्हें मानने वाले लोग टाना भगत कहलाये। मूलत: टाना मंत्र अहिंसा और असहयोग का ही था।

जतरा भगत को जेल में डाल दिया गया
जतरा भगत का प्रवचन सुनने के लिए दूरदराज से उरांव जनजाति का समूह जुटने लगा। वृहस्पतिवार को सामूहिक प्रार्थना का दिन निश्चित हुआ। उस दिन हल जोतने की मनाही थी। टाना भगतों ने अंग्रेजों की मालगुजारी, चौकीदार टैक्स भी देना बंद कर दिया। इस तरह गांधी अहिंसा और असहयोग आन्दोलन प्रारंभ कर दिया था। ब्रिटिश सरकार टाना आन्दोलन के बढ़ते प्रभाव से घबराने लगी थी। सरकार ने 1916 के प्रारंभ में जतरा भगत पर नियोजित ढंग से उत्तेजक विचारों के प्रचार का अभियोग लगाकर अनुयायियों की गिरफ्तारी शुरू की गई। जतरा भगत को जेल में बंद कर दिया गया। जेल में उसे काफी प्रताड़ित किया गया। जेल से बाहर आने के 2 – 3 माह बाद ही 28 वर्षीय जतरा भगत का देहावासन हो गया।

जतरा भगत के समर्थकों ने दायित्व संभाला
जतरा भगत के नहीं रहने पर उनके समर्थकों ने अंग्रेजों से संघर्ष का दायित्व संभाला। टाना भगत आंदोलन को ठप नहीं होने दिया बल्कि यह आंदोलन जो धार्मिक, सांस्कृतिक रूप में था, कालान्तर में बिहार के जनजातीय क्षेत्र में प्रखर एवं आदर्श सम्पूर्ण गांधीवादी जनान्दोलन साबित हुआ। टाना भगत अंग्रेजी शासन का शांतिपूर्ण एवं अहिंसक तरीके से विरोध करते रहे। यथा जमीन की मालगुजारी नहीं देना और अंग्रेजों से जनजातीय क्षेत्र को छोड़कर चले जाने को कहना शामिल रहा। सन 1917 तक जतरा भगत से प्रेरित टाना भगत अहिंसक तरीके से आन्दोलन चलाते रहे।

टाना भगत गांधी जी के समर्थक हो गए
महात्मा गांधी 1918 में रांची आये। उस समय के उत्साही कांग्रेसी कार्यकर्ताओं ने टाना भगतों को गांधी जी से मिलवाया। गांधी जी से पहली ही भेंट से अभिभूत होकर टाना भगत उनके समर्थक हो गये। गांधीजी का आन्दोलन और टाना भगत अन्दोलन अपने चारित्रिक विशेषताओं के बीच आश्चर्यजनक समानता के कारण दोनों ही आन्दोलन समरस भाव से अंग्रेजी शासन के विरूद्ध संघर्षरत हो गये। 1920 के बाद भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन में टाना भगतों का योगदान स्वर्णाक्षरों में लिखे जाने योग्य है। यह कहने में अतिशयोक्ति नहीं होगी कि टाना भगत आन्दोलन गांधी जी से भी अधिक गांधीवादी था। वह मूलत: जनजातियों की देशज संस्कृति की उपज थी। टाना भगत आन्दोलन छोटानागपुर की भूमि पर मौलिक अहिंसात्मक असहयोगात्मक आन्दोलन की रूपरेखा बनी।

अवज्ञा आन्दोलन में टाना भगतों ने दिया साथ
गांधी जी के अवज्ञा आन्दोलन (1941) के आह्वान के बाद टाना भगत सबसे आगे रहे। 17 अगस्त 1942 को श्रद्धानंद रोड, रांची में अधिक संख्या में टाना भगतों ने प्रदर्शन में भाग लिया। बहुत से लोग गिरफ्तार हुए। 19 अगस्त 1942 को चैनपुर और विशुनपुर के टाना भगतों ने विशुनपुर थाने में आग लगा दी। 21 अगस्त 1942 को मांडर के नजदीक सोनचिपी आश्रम जो उस समय टाना भगतों का मुख्य केंद्र था, उसका ताला तोड़ कर टाना भगतों ने पुन: अधिकार जमा लिया। पुलिस ने तालाबंदी कर दी थी। भारत छोड़ो आंदोलन में सभी टाना भगतों ने खुलकर भाग लिया और हजारों की संख्या में जेल गये। टाना भगतों ने पटना के पास फुलवारी शरीफ शिविर जेल के अंदर गांधी शिविर लगा दिया था। 

टाना भगतों की भूमि वापसी के लिए बना कानून 
देश को आजादी मिलने के बाद सरकार ने टाना भगतों की कृषि भूमि वापसी के लिए अधिनियम 1947 बनाया गया। कुछ लोगों की भूमि वापसी भी हुई। सरकार द्वारा पेंशन, बच्चों के लिए विद्यालय में मुफ्त शिक्षा आदि का प्रावधान किया गया। 1972 में कई टाना भगतों को तत्कालीन प्रधानमंत्री ने ताम्रपत्र प्रदान किया था। हालांकि 1947 में सरकार द्वारा बनाया गया भूमि वापसी अधिनियम बहुत अधिक कारगर नहीं पाया। सरकार द्वारा इस कानून में (1989) में संशोधन किया गया। इससे कई टाना भगतों को राहत मिली, लेकिन अभी भी यह कार्य पूरा होना बाकी है।