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बचपन में छूटा मां का साथ, नानी ने पाला; BPSC सिविल सेवा परीक्षा पास कर SDM बनीं हिमाली

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द फॉलोअप,बिहार
70वीं बीपीएससी परीक्षा में SDM पद के लिए चयनित हिमाली राज का सफर आसान नहीं रहा। हिमाली जब छोटी थी तो कम उम्र में ही उनकी मां का निधन हो गया। बचपन में मां का साथ छूटने के बाद मिताली को उनकी नानी ने पाला-पोसा। मां का साया सिर से हट जाने के बाद भी हिमाली ने हार नहीं मानी और अपनी अथक लगन से दूसरे प्रयास में बीपीएससी परीक्षा पास कर एसडीएम बनीं। 

असिस्टेंट प्रोफेसर के पद रहते हुए पास की बीपीएससी परीक्षा
मां के जाने के बाद हिमाली और उनके भाई-बहनों की पढ़ाई नाना-नानी के घर से पूरी हुई। उन्होंने अपनी सफलता का श्रेय मामा-मामी और नाना-नानी को दिया है। उनका कहना है कि अगर परिवार का साथ नहीं मिलता तो आज वो कामयाब नहीं हो पातीं। हिमाली ने बताया कि उनके चाचा सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी करते थे, जिन्हें देखकर वह बचपन में तय कर ली थी कि मैं भी प्रशासनिक सेवा में जाउंगी। उसके बाद वह लगातार प्रयास करती रही। इसी बीच हिमाली का चयन पटना वीमेंस कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में हुई, लेकिन फिर भी उनके मन में प्रशासनिक सेवा में जाने का जुनून सवार था। असिस्टेंट प्रोफेसर के पद रहते हुए और अपने कार्यों को निष्ठा और ईमानदारी से निर्वहन करते हुए हिमाली लगातार अध्ययनरत रही। बीपीएससी की पहली कोशिश में सफलता नहीं मिली। निराशा हुई, लेकिन वह हार नहीं मानीं। उसके बाद हिमाली ने अपनी कमियों को पहचाना और फिर से नई रणनीति और जुनून के साथ तैयारी शुरु की, और फिर नौकरी और पढ़ाई के बीच संतुलन बनाते हुए दूसरे प्रयास में सफलता हासिल की।

लक्ष्य तय कर और उसे पूरा करने पर फोकस
हिमाली ने बताया कि घंटों गिनकर पढ़ाई करने के बजाय रोजाना एक लक्ष्य तय कर और उसे पूरा करने पर फोकस रखने से ही सफलता प्राप्त किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि किसी भी प्रतियोगी परीक्षा में सफलता पाने के लिए अनुशासन बेहद जरुरी होता है। उन्होंने बताया कि सोशल मीडिया के बढ़ते प्रयोग से मोबाइल का इस्तेमाल सही औऱ सीमित रखा और खुद को पढ़ाई पर केंद्रित किया। उनका कहना है कि ईमानदारी, निरंतर प्रयास औऱ लक्ष्य के प्रति समर्पण ही सफलता की असली कुंजी है।

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