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वोटरलिस्ट अपग्रेडेशन को लेकर तेजस्वी ने चुनाव आयोग से पूछे 11 सवाल

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द फॉलोअप डेस्क
बीते दिन मंगलवार को RJD नेता तेजस्वी यादव ने वोटरलिस्ट अपग्रेडेशन को लेकर चुनाव आयोग पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। तेजस्वी ने चुनाव आयोग की मंशा और पारदर्शिता पर सवाल खड़े करते हुए इसे "भ्रम, अनिश्चितता और दमनात्मक रवैये" से भरा बताया है।
उन्होंने सवाल किया है कि “क्या इस पूरे अभियान की योजना किसी राजनीतिक दल से साझा की गई? क्या कोई सर्वदलीय बैठक हुई? क्या यह एकतरफा और गोपनीय चुनावी 'साफ-सफाई' नहीं है?” “यह कैसा पुनरीक्षण है, जहाँ हर हफ्ते नए आदेश आते हैं और पुराने आदेशों को बदला जाता है? क्या आयोग स्वयं सुनिश्चित नहीं है कि वह करना क्या चाहता है?” “भारत सरकार राज्य सरकार एवं पब्लिक सेक्टर उपक्रमों में कार्यरत कितने प्रतिशत कर्मी है और कितने प्रतिशत कर्मियों के पास को आई कार्ड/पेंशन पेमेंट ऑर्डर है? आँकड़ा बताए?”
दस्तावेजों पर खड़े किए सवाल
उन्होंने आगे सवाल किया और कहा कि “1/7/1987 के पूर्व सरकारी, स्थानीय प्राधिकार, बैंक ,पोस्ट ऑफिस, एलआईसी एवं पब्लिक सेक्टर उपक्रमों द्वारा निर्गत आई कार्ड/प्रमाण पत्र/दस्तावेज कितने प्रतिशत लोगों के पास है? RJD नेता ने 02 दिसंबर 2004 के बाद के मतदाताओं के लिए माता-पिता दोनों का पहचान पत्र अनिवार्य करने और आधार कार्ड व राशन कार्ड को अमान्य करने पर भी आपत्ति जताई। उन्होंने पूछा कि बिहार में कितने प्रतिशत लोगों के पास ये विशिष्ट दस्तावेज उपलब्ध हैं, जैसे सरकारी पहचान पत्र, जन्म प्रमाण पत्र, पासपोर्ट, शैक्षणिक प्रमाण पत्र, स्थायी आवासीय प्रमाण पत्र, वन अधिकार प्रमाण पत्र, जाति प्रमाण पत्र, NRC पंजीकरण या फैमिली रजिस्टर। उन्होंने जातीय सर्वेक्षण के आंकड़ों का हवाला देते हुए पूछा कि क्या उतने जाति प्रमाण पत्र निर्गत किए गए हैं।
समय और प्रक्रिया पर खड़े किए सवाल
चुनाव आयोग ने पिछली बार 2003 में वोटरलिस्ट अपग्रेडेशन का हवाला देते हुए शहरीकरण, सूचना के समय पर अद्यतन न होने और फर्जी/विदेशी नागरिकों के नामों की समस्याओं का जिक्र किया है। इस पर तेजस्वी यादव ने सवाल पूछा है कि यदि ये समस्याएं इतनी गंभीर थीं तो यह प्रक्रिया विधानसभा चुनाव से ठीक पहले क्यों शुरू की गई, जबकि नवंबर 2025 में चुनाव होने हैं। उन्होंने कहा कि "चुनाव से दो महीने पहले मात्र 25 दिन के भीतर इतना गहन पुनरीक्षण कैसे संभव होगा।"

तेजस्वी यादव ने आयोग के इस नियम पर आपत्ति जताई कि बीएलओ तीन बार मतदाता के निवास स्थल पर जाएगा और अगर मतदाता नहीं मिलेगा तो उसका नाम वोटर लिस्ट से काट दिया जाएगा। उन्होंने चिंता व्यक्त की कि इससे रोजी-रोटी कमाने के लिए घर से दूर रहने वाले लोग प्रभावित होंगे, खासकर आदिवासी, दलित, पिछड़ा और अल्पसंख्यक वर्ग के लोग। उन्होंने कहा कि ये लोग चुनाव के समय ही अपने गांव लौटते हैं, लेकिन काम छोड़कर भौतिक सत्यापन के लिए आना उनके लिए संभव नहीं होगा। 
तेजस्वी के इन सवालों ने वोटरलिस्ट अपग्रेडेशन को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है। खासकर चुनाव से पहले इसकी टाइमिंग और प्रक्रिया को लेकर। 

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