द फॉलोअप डेस्क
जामताड़ा जिले में 'मुख्यमंत्री जल नल योजना' विभागीय लापरवाही और खराब रखरखाव का शिकार हो गई है। वर्ष 2019-20 में ग्रामीणों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने के उद्देश्य से जिले के 435 टोलों में सोलर आधारित जलमीनारें स्थापित की गई थीं। लेकिन देखरेख के अभाव में आज इनमें से अधिकांश जलमीनार केवल शोपीस बनकर रह गई हैं। इस महत्वाकांक्षी योजना के तहत जिले भर में लगभग 19 करोड़ 57 लाख 50 हजार रुपये की राशि खर्च की गई थी। प्रत्येक जलमीनार के निर्माण पर लगभग 4.50 लाख रुपये की लागत आई थी। शुरुआत में ग्रामीणों को इसका लाभ मिला, लेकिन वर्तमान में कुल 435 में से करीब 350 जलमीनारें पूरी तरह खराब पड़ी हैं। जलमीनारों के बंद होने से सबसे बड़ा झटका क्षेत्र के गरीब और आदिवासी परिवारों को लगा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार प्रभावित आबादी लगभग 1,08,500 है, जिसमें अधिकांश अनुसूचित जनजाति के लोग हैं। भीषण गर्मी की शुरुआत के साथ ही पानी का संकट और गहरा गया है। महिलाएं और छोटे बच्चे पीने के पानी के लिए सिर पर बर्तन रखकर 1 से 2 किलोमीटर दूर पुराने जल स्रोतों तक जाने को मजबूर हैं।
विभागीय जानकारी के अनुसार, इन जलमीनारों की स्थापना करने वाली कंपनी के साथ 5 साल का मेंटेनेंस एग्रीमेंट था। यह अवधि समाप्त होने के बाद जलमीनारों को ग्राम समितियों को सौंप दिया गया। लेकिन बिना तकनीकी ज्ञान और आवश्यक फंड के ग्राम समितियां इनका रखरखाव करने में असमर्थ साबित हो रही हैं, जिससे करोड़ों की सरकारी संपत्ति बर्बाद हो रही है। पेयजल एवं स्वच्छता विभाग के एसडीओ अशोक पासवान ने बताया कि जलमीनारों के निर्माण के बाद पांच वर्षों तक संबंधित कंपनी के साथ मेंटेनेंस एग्रीमेंट था। अब इनकी संचालन और रखरखाव की जिम्मेदारी ग्राम स्तर पर तय की गई है। कई जगह मशीनों में खराबी आई है। विभाग ग्रामीणों और ग्राम समितियों के साथ समन्वय कर जलापूर्ति व्यवस्था को जल्द सुचारू करने की दिशा में काम कर रहा है।
