जीतेंद्र कुमार
कांग्रेस के एक नेता जी का बोल फिर बिगड़ गया। हालांकि पहले भी बिगड़ा था। बोल बिगड़ा तो निलंबित होना पड़ा। उस समय भी नेताजी ने सरकार के सिरोमणि पर प्रहार किया था। इस बार भी उन्होंने ऐसा ही किया। लेकिन इस बार उन्होंने अपनी भाषा की सारी शालिनता ताक पर रख दी। बोलते बोलते उन्होंने कई तरह के पोल खोल बैठे। आरापों की ऐसी झरी लगा दी कि बेटी भी शरमा गयी। बेटी को सोशल मीडिया पर पोस्ट करना पड़ा। कहना पड़ा, पिता से इस तरह की भाषा की अपेक्षा नहीं थी। जब बेटी को बुरा लगा है तो पार्टी के लोगों को भी लगा होगा। सरकार को बुरा न लगने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। तो क्या पार्टी फिर संज्ञान लेगी। अनुशासन समिति फिर बैठेगी। अब यह गंभीर सवाल खड़ा हो गया है। क्योंकि वीडियो राजू भी देख रहे हैं। परिस्थिति महतो भी समझ रहे हैं।

बोल बिगड़ने से कई तरह की उलझने भी पैदा होने लगी हैं। क्या नेता जी को इसके लिए कहीं से ऊर्जा तो नहीं मिली है। उन्हें किसी ने ऐसा बोलने के लिए उकसाया तो नहीं है। यह भी कि पार्टी के अन्य नेताओं के भी बीच बीच में बोल बिगड़ क्यों जा रहे हैं। फिर सुधर भी जाते हैं। लेकिन दवा का डोज कम होते ही बोलने की बीमारी फिर उभर क्यों आती है। अब इस पूरे प्रकरण का प्रभाव है कि पार्टी के बड़े नेता बोलने से बचने लगे हैं। अनुशासनहीनता के इस सवाल पर मुंह छिपा रहे हैं। लेकिन मूल सवाल भी यही है कि कब तक? पार्टी को बताना तो पड़ेगा। नेता जी के बोल सही हैं, या गलत हैं। सही है तो सरकार में क्यों? गलत है तो कार्रवाई नहीं क्यों?
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