द फॉलोअप डेस्क
उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने सोमवार देर रात स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया। उनका यह फैसला ऐसे समय आया है जब संसद का मानसून सत्र शुरू ही हुआ है। ऐसे में यह जानना जरूरी हो गया है कि उपराष्ट्रपति का चुनाव किस प्रक्रिया से होता है।
भारत में उपराष्ट्रपति न सिर्फ देश के दूसरे सबसे बड़े संवैधानिक पद पर होते हैं, बल्कि वे राज्यसभा के सभापति की जिम्मेदारी भी निभाते हैं। अगर किसी कारणवश राष्ट्रपति का पद खाली हो जाए, तो उपराष्ट्रपति अस्थायी रूप से राष्ट्रपति की जिम्मेदारी भी संभालते हैं। उपराष्ट्रपति के चुनाव में सिर्फ संसद के सदस्य यानी लोकसभा और राज्यसभा के सांसद ही हिस्सा लेते हैं। यहां तक कि राज्यसभा के मनोनीत सदस्य भी इस चुनाव में मतदान करते हैं। जबकि राष्ट्रपति चुनाव में संसद के सदस्यों के साथ-साथ राज्यों की विधानसभा के विधायक भी वोट डालते हैं।
उपराष्ट्रपति बनने के लिए कुछ जरूरी योग्यताएं होती हैं। उम्मीदवार भारत का नागरिक होना चाहिए और उसकी उम्र कम से कम 35 वर्ष होनी चाहिए। इसके अलावा, वह राज्यसभा का सदस्य बनने की सभी शर्तों को पूरा करता हो। उपराष्ट्रपति चुनाव लड़ने के लिए उम्मीदवार को 15 हजार रुपये की जमानत राशि भी जमा करनी होती है। अगर उम्मीदवार को कुल वोटों का छठा हिस्सा भी नहीं मिलता या वह चुनाव हार जाता है, तो यह राशि जब्त कर ली जाती है।
उपराष्ट्रपति का चुनाव खास तरीके से होता है। इस चुनाव में लोकसभा के 543 और राज्यसभा के 245 सांसद हिस्सा लेते हैं, जिनमें राज्यसभा के 12 मनोनीत सदस्य भी शामिल होते हैं। मतदान का तरीका आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली (Proportional Representation System) पर आधारित होता है, जिसे ‘सिंगल ट्रांसफरेबल वोट सिस्टम’ कहा जाता है। इस प्रणाली में प्रत्येक वोटर को एक ही वोट देना होता है, लेकिन उसे प्राथमिकता के आधार पर उम्मीदवारों को क्रम देना होता है। यानी वोटर बैलेट पेपर पर अपनी पहली पसंद को 1, दूसरी को 2 और तीसरी को 3 अंक देकर क्रम निर्धारित करता है।
वोटों की गिनती भी इस प्रणाली के अनुसार विशेष तरीके से होती है। सबसे पहले जरूरी कोटा तय किया जाता है। कुल डाले गए वैध वोटों को 2 से भाग दिया जाता है और फिर उसमें 1 जोड़ा जाता है। उदाहरण के तौर पर, अगर 787 सांसदों ने वोट डाले हैं, तो 787 को 2 से भाग देने पर 393.5 आता है। इसमें दशमलव हटाकर 393 लिया जाता है और फिर उसमें 1 जोड़ने पर जरूरी कोटा 394 बनता है। इसका मतलब यह है कि चुनाव जीतने के लिए किसी भी उम्मीदवार को कम से कम 394 वोट मिलने चाहिए।
गिनती की प्रक्रिया में पहले चरण में सभी उम्मीदवारों को मिली पहली प्राथमिकता वाले वोटों को गिना जाता है। अगर किसी उम्मीदवार को पहले ही चरण में जरूरी कोटे के बराबर या उससे अधिक वोट मिल जाते हैं, तो उसे विजेता घोषित कर दिया जाता है। अगर ऐसा नहीं होता है, तो सबसे कम वोट पाने वाले उम्मीदवार को बाहर कर दिया जाता है। उसके वोटों में दी गई दूसरी प्राथमिकताओं को देखा जाता है और वे वोट अन्य उम्मीदवारों में ट्रांसफर कर दिए जाते हैं। यदि इससे किसी उम्मीदवार के पास जरूरी संख्या में वोट हो जाते हैं, तो वही विजेता बनता है। अगर फिर भी कोई विजेता नहीं बनता, तो यही प्रक्रिया दोहराई जाती है जब तक कोई एक उम्मीदवार जीत नहीं जाता।
