द फॉलोअप टीम, डेस्क:
अफगानिस्तान में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। टीवी, अखबार और सोशल मीडिया अफगानिस्तान में हिंसा और संघर्ष की तस्वीरों से भरा पड़ा है। शहर की सड़कें और गलियां गोलियों की तड़तड़ाहट और धमाकों से गूंज रही है। हर तरफ अफरातफरी है। लोग समझ नहीं पा रहे हैं कि अफगानिस्तान में क्या चल रहा है। इसव वीडियो में हम आपको अफगानिस्तान में जारी संघर्ष और उसके कारणों के बारे में पूरी जानकारी देंगे।

राजधानी काबुल में घुसे तालिबानी लड़ाके
तालिबान के लड़ाके अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में प्रवेश कर चुके हैं। तालिबानी लड़ाकू ने अपने शीर्ष कमांडरों के साथ राष्ट्रपति भवन में कब्जा कर लिया है। अफगानिस्तान के मौजूदा राष्ट्रपति अशरफ गनी देश छोड़कर परिवार सहित भाग चुके हैं। इस बीच अफगानिस्तान के उप-राष्ट्रपति अमरूल्ला सालेह ने कहा कि वे अपनी जमीं और लोगों के साथ एक उद्देश्य के लिए थे। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान समर्थित दमन और क्रूर तानाशाही का विरोध करना ही उनकी वैधता है।

17अगस्त को 8 बजे तक घरों में रहने की हिदायत
रिपोर्ट्स के मुताबिक तालिबान ने लोगों को 17 अगस्त को सुबह 8 बजे तक घरों में रहने की हिदायत दी है। काबुल एय़रपोर्ट्स से कमर्शियल फ्लाइट्स बंद कर दी गई हैं। केवल सैन्य विमानों को उड़ाने की इजाजत दी है। यूनाइटेड नेशन सिक्योरिटी काउंसिल एक आपात बैठक करने वाला है जिसमें तालिबान द्वारा अफगानिस्तान पर कब्जा कर लिये जाने को लेकर चर्चा होगी।
तालिबान ने किया अच्छी सरकार का वादा
तालिबान के शीर्ष नेतृत्व ने कहा है कि वे अफगानिस्तान को एक अच्छी सरकार देंगे। उनका मकसद लोगों की सेवा करना है। राष्ट्रपति अशरफ गनी भाग चुके हैं। लोगों के मन में ये सवाल है कि तालिबानी सरकार में राष्ट्रपति कौन होगा। अभी तक मिली जानकारी के मुताबिक तालिबान के मुल्ला अब्दुल गनी बरादर को अफगानिस्तान का नया राष्ट्रपति नियुक्ति किया जा सकता है। अमेरिका अफगानिस्तान से अपने नागरिकों को निकालने की कवायद में लगा है। भारत भी नागरिकों को निकालने का प्रयास कर रहा है।

तालिबान का सरकारी कर्मचारियों को फरमान
तालिबान ने अफगानी सरकारी कर्मचारियों के लिए फरमान जारी किया है। कहा है कि वे तालिबान शासन के तहत 20 साल पहले की तरह लौटें। कहा गया है कि नई शुरुआत करें। रिश्वत, घोटाला, अहंकार, भ्रष्टाचार, आलस्य औऱ उदासीनता से सावधान रहें। कर्मचारियों से कहा गया है कि वो पहले जैसे हो जायें। जैसे कि वे 20 साल पहले तालिबान के शासन में थे। अफगानिस्तान के लोग अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से सहायता मांग रहे हैं। वे तालिबान और अफगान संघर्ष में हस्तक्षेप की मांग करते हैं।

संयुक्त राष्ट्र के महासचिव ने पते की बात कही है
संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव एंटोनियो गुटरेश ने एक ट्वीट कर कहा है कि अफगानिस्तान में जारी संघर्ष और मानवाधिकार के गंभीर उल्लंघन की खबरों के बीच वहां से हजारों लोग पलायन कर रहे हैं। यहां सालों बाद महिलाओं और लड़कियों को मिले मानवाधिकारों को बचाए रखने की जरूरत है। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने वैश्विक समुदाय से अपील की है कि जल्दीबाजी में तालिबानी सरकार को मंजूरी ना दें। अफगानिस्तान में शांति जरूरी है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि बाइडेन प्रशासन की अफगानिस्तान पॉलिशी पूरी तरह नाकामयाब रही।

अफगानिस्तान में कैसे हुआ तालिबान का जन्म
आखिर में जान लेते हैं कि तालिबान या तालिबानी आखिर हैं क्यों। तालिबान का शाब्दिक अर्थ पश्तो भाषा में छात्र होता है। गौरतलब है कि अफगानिस्तान और पाकिस्तान के पश्तून इलाकों में ये विचारधारा गहरा जड़ जमा चुकी है। आपकी जानकरी के लिए बता दें कि साल 1979 में सोवियत संघ ने अफगानिस्तान पर हमला किया था। सोवियत सेना ने तात्कालीन अफगान राष्ट्रपति को हटाकर वहां अपने समर्थन वाली सरकार की स्थापना की थी। इस दरम्यान सोवियत शक्ति को निष्प्रभावी करने के लिए अमेरिका का हस्तक्षेप हुआ। उसने यहां अलग-अलग हथियारबंद संगठनों को आर्थिक सहायता और हथियार देकर सोवियत सेना के खिलाफ लड़ने के लिए तैयार किया।
इसी में से एक संगठन था तालिबान। सोवियत सेना 1989 में वापस लौट गई। बदलते घटनाक्रम के बीच यहां तालिबान ताकतवर हो गया। तालिबन का यहां कब्जा हो गया। उसने अफगानिस्तान के अधिकांश इलाकों पर कब्जा कर लिया। तकरीबन 1 दशक तक तालिबानी यहां मजबूत स्थिति में रहे। यहां उनके बनाए नियम-कायदे चलते थे।

अमेरिका पर आतंकी हमले का तालिबान कनेक्शन
11 सितंबर 2001। आतंकी संगठन अल कायदा ने अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमला किया। हमले में तकरीबन 3 हजार नागरिकों की मौत हो गई। अमेरिका के पास ये जानकारी थी कि अलकायदा का सरगना ओसामा बिन लादेन को तालिबान ने पनाह दी है। तात्कालीन बुश प्रशासन ने तालिबान से लादेन को सौंपने को कहा लेकिन तालिबान ने इससे इंकार किया। बुश प्रशासन ने तालिबान के खिलाफ संघर्ष का एलान किया। हजारों की संख्या में अमेरिकी सैनिक अफगानिस्तान पहुंचे। आखिरकार अमेरिका तालिबान को अफगानिस्तान की सत्ता से हटा पाने में कामयाब रहा। तालिबान का प्रभाव सीमित हो गया। लेकिन 2014 के बाद से तालिबान दोबारा मजबूत होने लगा था।

अमेरिका और तालिबान के बीच क्या समझौता हुआ
अमेरिका पर वहां के नागरिकों का दवाब बढ़ता जा रहा था। सैनिकों के परिवार का भी दवाब बढ़ता जा रहा था। लोगों को लगने लगा था कि अमेरिका करोड़ों डॉलर उस संघर्ष में फूंक रहा है जिसका कोई हासिल नहीं है। आखिरकार डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिकी नागरिकों से वादा किया कि उनकी सरकार बनी तो वे अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों को वापस बुला लेंगे। धीरे-धीरे अमेरिकी सैनिकों की वापसी होने लगी। अब नवगठित बाइडेन प्रशासन ने घोषणा कर दी कि सितंबर तक सभी अमेरिकी सैनिकों को वापस बुला लिया जायेगा। दरअसल 2020 में अमेरिका और तालिबान के बीच एक समझौता हुआ था।
तालिबान ने वादा किया था कि वो अफगानिस्तान में एक शांतिपूर्ण सरकार देगा वहीं अमेरिका ने सैनिकों का वापस बुलाने पर सहमति जताई। इस समझौते के तहत जैसे-जैसे अमेरिकी सैनिकों ने लौटना शुरू किया, तालिबान ने अपना प्रभाव जमाना शुरू कर दिया। बीते 2 महीने तक चले संघर्ष के बाद आखिरकार तालिबान का अफगानिस्तान पर पूरी तरह से कब्जा हो चुका है। अफगानिस्तान वापस 20 साल पीछे जा चुका है।