जमशेदपुर
ग्रीन सिटी के नाम से पहचान रखने वाला जमशेदपुर अब अपनी हवा को लेकर गंभीर सवालों के घेरे में है। शहर की आबोहवा लगातार खराब हो रही है और सरकारी योजनाओं व प्रदूषण नियंत्रण के दावों के बावजूद इसका असर जमीन पर नहीं दिख रहा। 8 सितंबर की सुबह 8.01 बजे जमशेदपुर का एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) 120 दर्ज किया गया, जबकि इसका मानक स्तर 50 होना चाहिए। यानी हवा की गुणवत्ता निर्धारित सुरक्षित स्तर से ढाई गुना खराब रही। दरअसल, 101 से 200 के बीच का AQI खराब श्रेणी में माना जाता है, जिसका असर खासकर सांस और दिल से जुड़ी बीमारियों से जूझ रहे लोगों पर पड़ सकता है।
धनबाद-रांची से भी पीछे, 36वें स्थान पर जमशेदपुर
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के स्वच्छ वायु सर्वेक्षण-2026 में 10 लाख से अधिक आबादी वाले शहरों की श्रेणी में जमशेदपुर को राष्ट्रीय स्तर पर 36वां स्थान मिला है। इसके मुकाबले कोयला और खनन के लिए बदनाम धनबाद 17वें और रांची 27वें स्थान पर है। यानी औद्योगिक प्रदूषण के लिए पहचाने जाने वाले जमशेदपुर का प्रदर्शन इन दोनों शहरों से भी कमजोर रहा। यह स्थिति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जमशेदपुर को लंबे समय से हरियाली, बेहतर शहरी नियोजन और औद्योगिक विकास के साथ विकसित शहर के तौर पर पेश किया जाता रहा है। इसके बावजूद वायु गुणवत्ता सुधार के मामले में शहर की रैंकिंग पीछे खिसकना प्रदूषण नियंत्रण की मौजूदा रणनीति पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
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PM10 ने बढ़ायी चिंता, कई इलाकों में मानक से ऊपर
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मानक के मुताबिक PM10 की सीमा 100 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर होनी चाहिए, जबकि जमशेदपुर में अलग-अलग स्थानों पर यह 86 से 175.33 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक दर्ज की गयी। औद्योगिक क्षेत्र के एक केंद्र में PM10 की मात्रा 94.25 से 161.37 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक दर्ज होने की बात सामने आयी है। सल्फर डाइऑक्साइड का स्तर भी 30.70 से 46.05 माइक्रोग्राम और नाइट्रोजन ऑक्साइड 36.34 से 55.14 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर के बीच दर्ज किया गया। वहीं कुल सस्पेंडेड पार्टिकल्स की मात्रा 176 से 358 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक पहुंची।
80 करोड़ खर्च, फिर भी शहर में धूल और धुआं
सबसे बड़ा सवाल वायु गुणवत्ता सुधार के लिए चलाये जा रहे कार्यक्रमों पर है। वॉलीन/क्लीन एयर प्रोग्राम के तहत करीब 80 करोड़ खर्च किये गये, जिसके तहत शहर में फव्वारा लगाने और प्रदूषण कम करने के लिए मशीनें तक लायी गयी। लेकिन दावा है कि मशीनें बेकार पड़ी हैं और शहर में जिन स्थानों पर फव्वारा लगाने की योजना थी, वहां आज तक एक भी फव्वारा नहीं लगाया गया। यानी करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद अगर शहर की हवा सुरक्षित स्तर तक नहीं पहुंच पा रही है, तो सवाल यह है कि इन योजनाओं का वास्तविक लाभ शहरवासियों को कितना मिला।

बिना जांच जारी हो रहे प्रदूषण प्रमाणपत्र?
प्रदूषण नियंत्रण व्यवस्था की एक और गंभीर तस्वीर सामने आयी है। शहर में बिना समुचित जांच के वाहनों को प्रदूषण प्रमाणपत्र जारी किये जा रहे हैं। बिष्टुपुर और गोलमुरी के प्रदूषण जांच केंद्र बंद होने के बावजूद कई वाहनों को प्रमाणपत्र जारी किये जाने पर भी सवाल उठाये गये हैं। औद्योगिक इकाइयों की मॉनिटरिंग नहीं होने और कुछ कंपनियों को प्रदूषण मानकों के बावजूद प्रमाणपत्र मिलने के आरोप भी व्यवस्था की निगरानी पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं। यदि वाहनों और औद्योगिक इकाइयों के उत्सर्जन की नियमित और निष्पक्ष जांच नहीं होगी तो कागजों पर प्रदूषण नियंत्रण और जमीन पर प्रदूषण कम करने के दावों के बीच अंतर बना रहेगा।
अस्पतालों में बढ़ रहे मरीज
खराब हवा का असर अब स्वास्थ्य पर भी दिखाई देने की बात सामने आ रही है। जमशेदपुर के एमजीएम अस्पताल और टीएमएच की ओपीडी में सांस संबंधी मरीजों की संख्या में करीब 20 से 25 प्रतिशत तक बढ़ोतरी दर्ज की गयी है। खासकर छोटे बच्चे, बुजुर्ग और अस्थमा के मरीज प्रदूषित हवा से अधिक प्रभावित हो रहे हैं। इसके अलावा सुबह की सैर पर निकलने वाले लोगों के बीच भी आंखों में जलन और सांस लेने में परेशानी की शिकायत बढ़ने की बात सामने आयी है। हालांकि मरीजों की संख्या में बढ़ोतरी के पीछे केवल वायु प्रदूषण को जिम्मेदार ठहराने के लिए चिकित्सकीय अध्ययन जरूरी होगा, लेकिन खराब AQI और स्वास्थ्य संबंधी शिकायतों का बढ़ना निश्चित तौर पर चिंता का विषय है।

सवाल सिर्फ AQI का नहीं, सिस्टम की कार्यप्रणाली पर भी
जमशेदपुर की मौजूदा स्थिति अब सिर्फ खराब AQI का आंकड़ा नहीं रह गयी है। जब शहर में करोड़ों रुपये की योजनाएं चल रही हों, प्रदूषण नियंत्रण के लिए मशीनें खरीदी जा रही हों, वाहन प्रदूषण जांच की व्यवस्था मौजूद हो और इसके बावजूद AQI 120 तक पहुंच रहा हो, तो सवाल योजनाओं के क्रियान्वयन और निगरानी पर उठना स्वाभाविक है। कहना गलत नहीं होगा कि शहर को केवल ग्रीन सिटी कहने भर से हवा साफ नहीं होगी। सड़क की धूल, औद्योगिक उत्सर्जन, भारी वाहनों से होने वाला प्रदूषण, निर्माण कार्य और कचरा प्रबंधन पर ठोस कार्रवाई के साथ यह भी बताना होगा कि स्वच्छ हवा के नाम पर खर्च हुए करोड़ों रुपये का जमीन पर कितना असर हुआ।