द फॉलोअप डेस्क
प्रकृति का महापर्व सरहुल गढ़वा में पारंपरिक श्रद्धा और उल्लास के साथ धूमधाम से मनाया गया। सरहुल के मौके पर शनिवार को झारखंड सरकार के पूर्व मंत्री और झामुमो के केंद्रीय महासचिव मिथिलेश कुमार ठाकुर नगदरवा गांव पहुंचे। वहां आदिवासी परिवारों के साथ पूर्व मंत्री मिथिलेश ठाकुर ने मांदर बजाकर सरहुल मनाया। उन्होंने सभी को सरहुल की बधाई देते हुए उनके जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और नई ऊर्जा के संचार की कामना की। मिथिलेश ठाकुर ने कहा कि सरहुल का पर्व मूलतः प्रकृति और जीवन के बीच सामंजस्य को रेखांकित करता है। यह पर्व मुख्य रूप से आदिवासी समुदायों का प्रमुख प्रकृति पर्व है, जो वसंत ऋतु में चैत्र माह की शुक्ल पक्ष तृतीया को मनाया जाता है। यह पर्व प्रकृति के प्रति आभार प्रकट करने, साल वृक्ष की पूजा, नई फसल का स्वागत और नए साल की शुरुआत के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। उन्होंने बताया कि सखुआ के पेड़ को आदिवासी संस्कृति में पवित्र माना जाता है, जिसे सरना मां का वास माना जाता है। इस दिन साल के नए फूल (सारजोम बाहा) की पूजा की जाती है। सरहुल का अर्थ ही वर्ष की शुरुआत है, जो नई फसल और प्रकृति के नए चक्र का प्रतीक है। इस दिन पाहन (पुजारी) बारिश और अच्छी फसल की भविष्यवाणी करते हैं।
यह पर्व पूरे समुदाय के लिए नृत्य-संगीत और सामूहिक खुशी साझा करने का अवसर प्रदान करता है। यह सदियों पुरानी परंपरा है, जिसे महाभारत काल से संबंधित माना जाता है, जब आदिवासी पूर्वजों को साल के फूल अर्पित करते थे। इस दिन सुबह पूजा के बाद, पाहन मिट्टी के बर्तनों में जल भरकर रखते हैं, जिससे आने वाली बारिश और फसल का अनुमान लगाया जाता है। इस अवसर पर पारंपरिक नृत्य, संगीत, शोभायात्रा और गुड़-पिठ्ठा जैसे पारंपरिक पकवान प्रमुख रूप से तैयार किए जाते हैं। यह पर्व वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी प्रकृति के साथ संतुलन और विकास का संदेश देता है। आदिवासी समाज प्रकृति को अपना जीवन आधार मानकर उसे नमन करते हैं।
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