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BCI में महिलाओं के मनोनयन के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट के बाहर अधिवक्ताओं ने किया प्रदर्शन

BCI में महिलाओं के मनोनयन के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट के बाहर अधिवक्ताओं ने किया प्रदर्शन

द फॉलोअप डेस्क, रांचीः

झारखंड हाईकोर्ट की अधिवक्ता स्वाति सिन्हा के नेतृत्व में आज बार की स्वतंत्रता को लेकर शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन का आयोजन किया गया। स्वाति सिन्हा के साथ अन्य राज्यों की महिला अधिवक्ताओं ने आज उच्चतम न्यायालय के बाहर एक शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन किया। इस प्रदर्शन में झारखंड सहित पूरे देश से महिला और पुरुष अधिवक्ता बड़ी संख्या में शामिल हुए। योगमाया बनाम भारत संघ मामले में BCI में महिलाओं के लिए 30 प्रतिशत आरक्षण दिया गया था, जिसमें 20 प्रतिशत चुनाव के माध्यम से और 10 प्रतिशत सहयोजन (को-ऑप्शन) के माध्यम से रखा गया था। सहयोजन का मुख्य उद्देश्य यह था कि महिलाएं अक्सर आगे नहीं आ पातीं और चुनाव नहीं लड़तीं, इसलिए उन्हें सहयोजित किया जाएगा। लेकिन सवाल यह है कि जब महिलाएं मौजूद हैं, जिन्होंने चुनाव लड़ा और छठे-सातवें स्थान पर आईं, तो बाहर से महिलाओं को लाने की क्या आवश्यकता है? स्वाति सिन्हा का कहना है कि यह पक्षपात (फेवरिटिज्म) को बढ़ावा देगा, क्योंकि ऐसे ही लोगों को लाया जाएगा जो उनके पसंदीदा या करीबी होंगे।

इस मनमाने आदेश के खिलाफ यह विरोध शुरू किया गया है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश में कहा गया है कि जो 2 महिलाएं सहयोजित होंगी, उनमें से एक सीनियर एडवोकेट होगी और एक रिटायर्ड जज होगी। सिन्हा के मुताबिक अब सवाल उठता है कि जो महिलाएं चुनाव में छठे-सातवें स्थान पर रहीं, उनको नहीं लिया गया, बल्कि ऐसे लोगों को सहयोजित किया जा रहा है जिन्होंने इस चुनाव में हिस्सा ही नहीं लिया। बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने भी इस विषय में अपना आवेदन लगाया था, जिसमें उन्होंने यह तंत्र सुझाया था कि जो महिलाएं छठे-सातवें स्थान पर हैं, उन्हीं को सहयोजित किया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने भी पहले कहा था कि यह एक निष्पक्ष तंत्र है, लेकिन अचानक 4 अगस्त 2026 को एक आदेश आ गया कि एक सीनियर एडवोकेट और एक रिटायर्ड जज रहेंगी।

स्वाति सिन्हा के मुताबिक अनुच्छेद 220 कहता है कि हाईकोर्ट की रिटायर्ड जज जिस राज्य से सेवानिवृत्त हुई हैं, वहां वकालत नहीं कर सकतीं। जब वे वकालत ही नहीं कर सकतीं, तो वे बार काउंसिल की सदस्य कैसे बन सकती हैं? और यह भी कि BCI जैसी संस्था और एडवोकेट्स एक्ट, 1961 के होने के बावजूद भी सभी राज्यों के माननीय मुख्य न्यायाधीशों को यह शक्ति दे दी जाती है कि वे सहयोजन करें। इससे बार की आजादी खत्म होगी और बार के मामलों में अनावश्यक रूप से न्यायपालिका का हस्तक्षेप बढ़ेगा। यह हमें स्वीकार नहीं है। बार की आजादी हमें प्यारी है और जिन अधिवक्ताओं ने वोट देकर इन महिलाओं को छठे-सातवें स्थान पर पहुंचाया है, उनके साथ भी यह धोखा है।

Tags - BCI co-option women advocates Supreme Court protest