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संपादकीय डेस्‍क से: आत्ममुग्धता के शोर में ख़ामोशी से रोशनी फैलाता एक शख़्स 

'हम लबों से कह न पाए उनसे हाल-ए-दिल कभी, और वो समझे नहीं ये ख़ामोशी क्या चीज़ है।

जातिगत जनगणना से घबराना कैसा, नये आधार तय कर ज़रूर होनी चाहिए

'उपजातियों तक विभाजन की गणना होनी चाहिए।

धर्म: प्रकृति रूपी परमेश्वर ने दो ही जातियां बनाई हैंं, स्त्री और पुरुष

प्रकृति से बड़ा इस धरा पर कोई खुदा-ईश्वर अथवा धर्म या मजहब नहीं

साबरमती का संत-4 : गांधी को समझ जाएँ तो दुनिया में आ सकते हैं कल्पनातीत परिवर्तन 

'आने वाली नस्लें शायद मुश्किल से ही विश्वास करेंगी कि हाड़-मांस से बना हुआ कोई ऐसा व्यक्ति भी धरती पर चलता-फिरता था’

पाकिस्‍तान यात्रा-4: हिन्दू संस्कारों की वजह से मैं अलग प्लेट या थाली का इंतज़ार करने लगा

'30 सितम्बर, 1988 हैदराबाद सिन्ध के इतिहास को ‘ब्लैक फ्राइडे’ के नाम से जाना जाता है।

समाजवाद के नाम पर बनी पार्टी के टुकड़े कई हुए कोई यहां गया, कोई वहां गया

'सोशलिस्ट पार्टी कितने टुकड़ों में बँटी तथा कितनी सिद्धांतवादी रही यह तो खुद सोशलिस्टो को भी नहीं मालूम।

राज कपूर के पहले संगीत निर्देशक राम गांगुली, जिनके लिए 'जिया बेक़रार है...'

1947 से शुरु हुआ उनका सफर 1974 में उनकी अंतिम फ़िल्म सुहानी रात के साथ ही सिमट गया।

साबरमती का संत-3 : महात्‍मा गांधी के किसी भी आंदोलन में विरोधियों के प्रति कटुता का भाव नहीं रहा

‘आने वाली नस्लें शायद मुश्किल से ही विश्वास करेंगी कि हाड़-मांस से बना हुआ कोई ऐसा व्यक्ति भी धरती पर चलता-फिरता था’

मेरे ये गीत याद रखना, कभी अलविदा ना कहना !

'अपने सार्वजनिक जीवन में बेहद चंचल, खिलंदड़े, शरारती और निजी जीवन में बहुत उदास,खंडित और तन्हा किशोर कुमार रूपहले परदे के सबसे रहस्यमय और सर्वाधिक विवादास्पद व्यक्तित्वों में एक रहे हैं।

साबरमती का संत-2 : ट्रस्टीशिप के विचार को बल दें, परिष्कृत करें, ठुकराएं नहीं 

' पूंजीवादी शक्तियां भी मार्क्सवाद और गांधीवाद के सिद्धांतों को समझती हैं।

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